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शिवरात्रि और आर्य समाज

Posted On 10 Feb, 2018 में

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पर्व हमारी सांस्कृतिक चेतना के अभिन्न अंग हैं। पर्वों से जीवन में उल्लास, उत्साह, गति, संगति, चेतना एवं प्रेरणा मिलती है। परस्पर संगठन की भावना जाग्रत होती है। पर्व जीवन्त चेतना के प्रतीक हैं। भारतीय संस्कृति पर्वों से भरी-पूरी है। जंतुओं, फसलों, महापुरुषों, धर्मगुरुओं, तीर्थों और विशेष घटनाओं के साथ पर्वों का गहरा सम्बन्ध है। इसलिए भारतीय जन-मानस पर्वों के आगमन की प्रतीक्षा में उत्सुक रहता है।

शिव रात्रि भरत का महान् पर्व है। इसका सम्बन्ध शिव जी की उपासना, व्रत एवं संकल्प से है। सभी धार्मिक-आस्था वाले इस को किसी न किसी रूप में महत्त्व देते हैं इसी दिन देवात्मा दयानन्द को आत्मबोध हुआ था। हृदय में सत्यज्ञान और धर्म का प्रकाश उदय हुआ था। जीव परिवर्तन की ओर मुड़ गया था। इसलिए आर्य समाज का शिवरात्रि के साथ विशेष एवं गहरा सम्बन्ध है। आर्य समाज के इतिहास में यह दिन सदैव स्मरणीय और वन्दीय रहेगा। यह दिन सदैव स्मरणीय और वन्दनीय रहेगा। यह तिथि ही आर्य समाज के निर्माण का शुभारम्भ है। अतः आर्य समाज के लिए यह दिन बोधोत्सव है। ज्ञान पर्व है। ज्योति और प्रकाश का महोत्सव है। जीवन परिवर्तन का अवसर है। व्रत और संकल्प का प्रभात है। निर्माण और चेतना की मंगल बेला है। इसी पुण्य तिथि पर महामानव दयानन्द के हृदय में सत्य का तूफान उठा था। सारी रात श्रद्धा, आस्था तथा निष्ठा से भरा हुआ सच्चे शिव के दर्शन के लिए एकटक लगाये हुए जागता रहा। जब कि सारा मन्दिर निद्रा की गोद में था। विचित्र घटना घटित हुई। चूहा शिव जी के नैवेद्य को निडर होकर खा रहा है। उस ऋषि का विश्वास, आस्था एवं श्रद्धा खण्डित हो उठी। मन नाना प्रकार के संकल्प-विकल्पों में डूब गया। अनेक प्रश्न उभरने लगे। शिवरात्रि का व्रत तोड़ दिया। यह सच्चा शिव नहीं हो सकता है? जो एक चूहे से भी अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा है? वह हमारी रक्षा क्या करेगा? स्वामी जी सच्चे शिव के दर्शन और प्राप्ति के लिए निकल पड़े। अन्ततः सच्चे शिव के दर्शन और प्राप्ति में सफल हुए। इसी मूल घटना ने मूलशंकर को महर्षि दयानन्द के नाम से इतिहास और संसार में प्रसिद्ध किया।

आर्य समाज की रीति-नीति, पूजा-पद्धति  मान्यताएं, दर्शन, चिन्तन आदि अन्य मत-मतान्तरों व विचारधाराओं से अलग है। इसके मूल आधार में सत्य, धर्म, कर्म एवं बुद्ध है। इसमें अंधविश्वास, पाखण्ड, झूठ, मन्त्र-तन्त्र, जादू-टोना एवं रूढ़िवादिता आदि नहीं है। यह तो सत्य-सनातन वैदिक परम्परा का ही प्रचारक और प्रसारक रहा है। इसी कारण आर्य समाज पन्थ, मजहब, सम्प्रदाय आदि नहीं है। यह तो एक जीवन्त क्रांति है। आन्दोलन है। जीवन पद्धति है। सुधारक-चिन्तन है। इसमें किसी देवदूत, पैगम्बर और अवतार का स्थान नहीं है। इसमें एकेश्ववाद को पूजा है। परमात्मा एक है। वह तीनों कालों में विद्यमान रहता है। वह जन्म-मरण-सुख-दुःख आदि सांसारिक बातों से पृथक् है। उसके गुण-कर्म स्वभाव से असंख्य नाम हैं। वह गुण-कर्म-स्वभाव के कारण सविता, विष्णु, रुद्र, गणेश आदि अनेक नामक हैं। जैसे व्यक्ति एक होता हे वह किसी का पुत्र है, किसी का पिता है, किसी का पति है, तो किसी का भाई है। गुण-कर्म स्वभाव से उसके कई रूप हैं। ऐसे ही परमात्मा भी अनेक रूपों वाला है। उसका एक नाम शिव भी है। शिव का अर्थ है जो सदैव मंगल और कल्याण करता है। ये दोनों गुण उस परमात्मा में सदैव रहते हैं। अतः वह घट-घट व्यापी परमात्मा ही सच्चा शिव है। उसी की पूजा-उपासना और साधना करनी चाहिए।

आज सत्य और इतिहास ओझल हो गया है। अन्धविश्वास और रूढ़ियों की पूजा होने लगी है। धर्मग्रन्थ, पुराण एवं इतिहास साक्षी है-कि प्राचीन काल में यहां नागजाति का राज्य रहा है। नागजाति के गणपति शंकर जी थे। नागजाति शिव जी का चिह्न अपने मुकुट पर लगाती थी। नागजाति के गणपति शंकर जी थे। नागजाति शिव जी का चिह्न अपे मुकुट पर लगाती थी। नागजाति ने राष्ट्र का सर्वोच्च रक्षक शिव जी को मान कर उनके नाम के अनेक मन्दिर स्थापित किये थे। शिव जी का समबन्ध नागजाति से था। आज हमने नाग का अर्थ सर्प करके शिव जी के गले में सर्पों की माला पहना दी। शिव जी का लिंग अर्थात् ह्नि त्रिशुल था। नागजाति के त्रिशूल रूपी चिह्न को अपने राज्य की ध्वजा घोषित किया था। आज भी प्रत्येक राष्ट्र की अपनी अलग-अलग ध्वजाएं हैं। हमने अर्थ का अनर्थ करके लिंग का अर्थ शिश्न लगाया। जोकि तर्क संगत नहीं है। यह इतिहास के अनुसन्धान का विषय है। आर्य समाज ऐसे अनेक सत्य तथ्यों तक सबको बताना और पहुंचाना चाहता है।

आर्य समाज राष्ट्र, समाज, जाति और जीवन में व्याप्त अनेक बुराईयों, सामाजिक कुरीतियों, अन्धविश्वासों एवं पाखण्डों को हटाना और मिटाना चाहता है। आज मन्दिर अपने वास्तविक स्वरूप से हटते जा रहे हैं। जो स्थान धार्मिक, सात्विक, सव्रहितकारी, शान्त, प्रेम, दया, सेवा आदि के स्थल होने चाहिए। वहां हिंसा लूट-पाट, अधार्मिकता, लड़ाई झगडे़ आदि हो रहे हैं। अनहोनी घटनाएं हो रही हैं। मानव की प्रवृत्तियां पशुता की ओर जा रही हैं। मानवीय मूल्य बड़ी तेजी से बदले और तोडे़ जा रहे हैं। ऐसे विकट समय में आवश्यकता है हिन्दू जाति को अपने गौरवमय इतिहास से संस्कृति से, आदर्श ग्रन्थों से, महापुरुषों से, इतिहास से और महान् परम्पराओं से शिक्षा तथा प्रेरणा लेनी चाहिए।

महर्षि के जीवन में शिवरात्रि की रात सत्य की खोज और जीवन-परिवर्तन का कारण बन कर आई थी। इस से पूर्व कितनी शिवरात्रियां आई होंगी? आ भी आ रही हैं? कहीं कोई परिवर्तन नजर नहीं आता है। कोई भी मूल सत्य तक नहीं पहुंच सका है। यह उस महाभाग की गहन चेतना और पकड़ का ही परिणाम है कि उसने शंकर के मूल को खोज निकाला। ऋषि महान् शिक्षक और उद्धारक थे। उन्होंने संसार के लागों को अन्धकार से प्रकाश की ओर असत्य से सतय की ओर अधर्म से धर्म की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर आने का मार्ग दिखाया। वे भारत को वैदिक कालीन गौरव, आदर्श और सम्मान में देखने का स्वप्न लेकर आए थे। वे मनु के इस कथन को साकार करना चाहते थे-

एतद्देशप्रभूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षरेन् पृथिव्यां सव्रमानवाः।।

समग्र वसुधा के लोगो! भारतभूमि की शरण में आओ। यहां से जीवन और चरित्र के लिए उन्नत शिक्षा ग्रहण करो। इसी में तुम्हारा कल्याण सम्भव है।

उस महायोगी का वेद, धर्म, संस्कृति, शिक्षा, नारीउद्धार, शुद्ध एवं राष्ट्रीय एकता आदि प्रत्येक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण एवंम् स्मरणीय योगदान रहा है। उन्होंने जीवन में कभी भी गलत बातों के लिए समझौता नहीं किया था। वे सतय के पोषक थे। सत्य मय जीवन जिया। सत्य केए ही हंसते-हंसते जहर पी गए। कवि के शब्दों में -

सदियों तक इतिहास समझ न सकेगा। तुम मानव थे या मानवता के महाकाव्य।। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के जन्मोत्सव पर ऋषि दयानन्द को बारम्बार नमन लेख-दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

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