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अंधविश्वास और आस्था एक साथ कैसे चलेगी..

Posted On 19 Jan, 2018 में

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अंधविश्वास के चलते मुंबई के विरार में एक 11 साल की बच्ची की जान चली गयी। मासूम सानिया को कब्ज की शिकायत थी। डॉक्टर से इलाज न करवाकर सानिया की मां ने सानिया के साथ काला जादू किया। इस दौरान उसने सानिया के सीने पर चढ़कर डांस किया। काला जादू करने से पहले सानिया की चीख को बाहर जाने से रोकने के लिए उसके मुंह में कपड़े ठूंसे गए थे। दर्द तड़फती इस मासूम बच्ची के उसकी चाची ने उस वक्त उसके पैर पकड़े हुए थे। अंत में बच्ची ने दम तोड़ दिया। बेशक लोगों के ये जनाजा छोटा था लेकिन सानिया के सवालों ने इसे भारी जरूर बना दिया। यह मात्र संयोग नहीं है कि जिस समय तमाम टीवी चैनलों पर भूत-प्रेत और मृतात्माओं से संबंधित सीरियलों की बाढ़ आई हो उसी समय एक ऐसी हत्या का हो जाना भला किसी को चकित क्यों करेगा?

हम दुनिया के सामने अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर भले ही कितना ही इतरा लें, लेकिन इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि देश के एक बड़े तबके के जीवन में अंध विश्वास घुल- मिल सा गया है। आज भी झाड़-फूंक, गंड़ा-ताबीज, ड़ायन-ओझा, पशु या नरबलि जैसी कुप्रथाओं से निपटना एक बड़ी चुनौती भरा काम है। आजकल धर्म के आधार पर ऐसी-ऐसी बाते की जाने लगी हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक या तार्किक आधार नहीं है।

भगवान की आज्ञा का अंदाज लगाकर अंधविश्वास शुरू करने वाले तमाम लोग पता नहीं इस खबर से कितने सहमे होंगे? लेकिन हर रोज किसी न किसी घर गाँव या शहर इस तरह की खबरें आना आम सी बात हो गयी हैं। पढ़े लिखे लोग चाहे वे वैज्ञानिक हां या डॉक्टर, अंधविश्वास के शिकार हो जाते हैं। दूसरी ओर वैज्ञानिक बातों के संस्कार आज की शिक्षा में अथवा समाज में नजर नहीं आते और वैज्ञानिक विपरीत व्यवहार करते हैं। इससे अगर बचना है, तो एक व्यूह निर्माण जरूर करना होगा। अंधविश्वास के विरु( जनजागरण का कार्य निःसंकोच निडरता से और प्रभावी ढ़ंग से होना चाहिए। यह जागृति विज्ञान का प्रसार ही नहीं बल्कि मनुष्यता पर एक उपकार भी होगा।

दरअसल धर्म के अन्दर मूर्खता की मिलावट बड़ी सावधानी से की गयी है, इस कारण जब कोई अंधविश्वास के खिलाफ बात करता है तो उसे आसानी से धर्म विरोधी तक कह दिया जाता है। जबकि अंधविश्वासी व्यवहार खुलेआम शोषण को बढ़ावा देता है। हाल ही में कई बाबाओं का पकड़ा जाना, धर्म की आड़ में उनके शोषण के अड्डों का खुलासा होना कोई लुका छिपी की बात नहीं रही। पर सवाल अब भी वहीं खड़ा है कि इन सब तमाम पाखण्ड और अंधविश्वासों के लिए क्या केवल गरीब, अशिक्षित ही दोषी है या पढ़े लिखे देश के जाने-माने गणमान्य चेहरे भी? क्योंकि साल 2015 की बात है देश की वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष इंदौर की सांसद श्रीमती सुमित्रा महाजन भी अंधविश्वास के इस कुण्ड में आहुति देते नजर आई थीं। जब मध्यप्रदेश के निमाड़ व मालवा अंचल में मानसूनी बारिश न होने से वहां के निवासी इंद्र देवता को मनाने की जुगत में जुटे थे तब पंढ़रीनाथ स्थित इंद्रेश्वर मंदिर में पहुंच कर रूद्राभिषेक करने लगी। यहां तक भी ठीक था लेकिन उन्होंने अंधविश्वास की सारी हदे लांघते हुए माला भी जपना शुरू कर दी थी। पांच दिन बाद बारिश हुई लोगों ने माला का जपना, बारिश का आना एक जगह जोड़कर इस अंधविश्वास को आस्था का जामा पहना दिया।

हालांकि एक जिम्मेदार महिला होने के नाते उन पर यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि आखिर इस तरह के ढ़कोसले से ही यदि तमाम काम हो सकते थे तो फिर देश के आम गरीब के टैक्स की राशि को व्यर्थ में ही मौसम से जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधानों में क्यों गंवाया जा रहा है? इसके कुछ दिन बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री सि(रमैया ने अपनी आधिकारिक गाड़ी को इस अंधविश्वास की वजह से बदल दिया था कि उनकी गाड़ी पर कोंवा बैठ गया था।

कुछ इसी तरह का कृत्य कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रहे बीएस येदियुरप्पा ने एक बार अपनी सरकार बचाने के लिए न केवल मंदिरों में पूजा-अर्चना कि थी बल्कि दुष्ट आत्माओं से रक्षा के लिए एक पुजारी से प्राप्त ताबीज को भी ग्रहण किया था। कमाल देखिये एक राजनितिक पार्टी काला जादू कर रही थी और दूसरी उससे डर रही थी यह भारत में ही संभव है। अधंविष्वास से ओतप्रोत इस तरह के कारनामों की भारत में कमी नही है। इस तरह का यह पहला मामला भी नही है। अक्सर हमें राजनेताओं द्वारा वास्तु और ज्योतिष के हिसाब से घरों व कार्यालयों का चुनाव या उसमें फेरबदल कराने की कोशिशें भी देखने-सुनने को मिलती रही हैं।

नेता हो या खिलाड़ी या फिर जाने माने अभिनेता देश को दिशा देने वाले कर्णधारों को लेकर अंधविश्वास की ये खबरे हमें पढने-सुनने व देखने को मिलती रहती हैं। हमारे ये नीति निर्धारक ज्योतिषियों, तांत्रिकों , वास्तुविदों की सलाह पर अच्छा मुहूर्त देख कर पर्चा दाखिल करने, सरकारी आवास का नम्बर चुनने और खिड़की दरवाजे की दिशा बदलने, झाड़-फूंक वाले ताबीज पहनने से भी गुरेज नहीं करते हैं। जब नियम नीतियों, कानूनों को अमलीजामा पहनाने वाले लोग ही स्थितियों को तर्कों की कसौटी पर परखने के बजाय एक अंधी दौड़ में शामिल हो जाएं तो आम लोगों में तर्कसंगत सोच के विकास की उम्मीद भला कितनी की जा सकती है? वैज्ञानिक के अवैज्ञानिक व्यवहार को सुधारने के लिए जागरुकता अनिवार्य हो गई है। लेकिन कटु सत्य यह है कि जनजागरण के प्रमुख स्थानों पर ही अंधविश्वास का डेरा है। उससे तो यही प्रतीत हो रहा है कि कोई न कोई इसे पाल-पोस कर समाज में जिन्दा रखने का पक्षधर है। यदि ऐसा है तो फिर किसी मासूम सानिया की मौत पर सवाल कौन खड़े करेगा या कौन इस तरह की मौत का जिम्मेदार होगा?

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