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अब दीपावली पर कानून का हथोडा

Posted On 11 Oct, 2017 में

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आस्था और भावना का ही एक मौलिक रूप है धर्म, जिसमें परम्पराएँ, पूजा, उपासना निहित होती है जोकि  उत्सव, त्यौहार आदि के मनाने के तरीकों से लेकर पारम्परिक विधि ही धर्म का आंतरिक और बाहरी रूप सामने रखती है. हमेशा से पूजा उपासना करने की विधि और उत्सवों से जुडी परम्परा ही लोगों के धर्मों को विभाजित करती है, वरना कौन नहीं जानता कि ईश्वर एक है. जन्म से मृत्यु तक हर किसी के अपने जीवन जीने के तौर तरीके और कर्म-कांड होते है. जिन तौर तरीकों को अधिकांश लोग एकमत होकर बिना विरोध के स्वीकार कर ले उसे पारम्परिक परम्परा का नाम दे दिया जाता है. हाल ही में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में दिवाली पर पटाखों की बिक्री पर रोक लगा दी है. दिवाली के अवसर पर पटाखों के कारण होने वाले प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1 नवंबर तक के लिए दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर रोक लगा दी है. मतलब पिछले वर्ष 11 नवंबर 2016 का बिक्री पर रोक का आदेश फिर से बरकरार रहेगा.

समाज हित में जाने वाले फैसले अक्सर कई विवादित बन जाते है क्योंकि लोग उन्हें अपनी आस्था और परम्पराओं पर चोट के रूप में देखते है. कई फैसले अन्य मत-मतान्तरों में तुलना की द्रष्टि से विवादित भी माने जाते रहे है. पिछले दिनों दक्षिण भारत के एक पारम्परिक त्यौहार जलीकट्टू पर विरोध के सिलसिले में दक्षिण भारत उबल पड़ा था. उस समय भी सवालों से सुप्रीम के फैसले को दो चार होना पड़ा था. हमने पहले भी लिखा था कि अक्सर हमारे देश में बहुतेरे फैसले जन भावनाओं को ध्यान में रखकर लिए जाते है.लेकिन पिछले कुछ समय में सबने देखा कि ज्यादतर फैसलों में सुप्रीम कोर्ट को विरोध का सामना ही करना पड़ा है चाहें उसमें जन्माष्ठमी की दही हांड़ी प्रतियोगिता हो या महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, केरल व गुजरात में परंपरागत बैलगाड़ी दौड़ प्रतियोगिता.

दरअसल देश में बहुसंख्यक समुदाय के पारम्परिक उत्सवों, त्योहारों पर उनके मनाने ढंग पर रोक लगाना हटाना वोट की राजनीति का हिस्सा सा बन गया. राजनेता इसे बखूबी इसे अंजाम भी देते है. लोग सवाल खड़े कर पूछ रहे है क्या नववर्ष पर पटाखा जलाने से प्रदूषण नहीं होता? दीपावली पर पटाखा बिक्री पर लगी रोक से किसी को शायद ही दुःख हो स्वास्थ के लिहाज से इसे सब अच्छा कदम बता रहे लेकिन सवाल सबका यह कि क्या यह अन्य मतो के धार्मिक उत्सवों और परम्पराओं के तौर तरीकों पर भी कानून रोक लगा सकता है?

पेटा जैसी संस्था का जलीकट्टू पर पशुओं के प्रति दया दिखाना लेकिन ईद पर लाखों पशुओं की कुर्बानी और क्रिसमस पर टर्की नामक पक्षी को भूनकर खाने पर मौन हो जाना, बैलगाड़ी दौड़ प्रतियोगिता पर रोक लगवाना लेकिन रेसकोर्स की घुड़दौड़ की अनदेखी करना, कोर्ट का जन्मअष्टमी पर दही हांड़ी को लेकर किशोरों का दर्द महसूस करना लेकिन मोहरम पर खामोश हो जाना बस यहीं सवाल खड़े हो जाते है कि देश एक है तो कानून एक क्यों नहीं है? इसे धार्मिक भावनाओं के आधार पर रखकर सोचिये क्या ऐसा नहीं लगता कि यह बहुसंख्यक समुदाय की आस्था पर चोट हो? समय से साथ न जाने कितने परिवार पटाखों को लेकर स्वास्थ और सुरक्षा की द्रष्टि से नकार चुके है. वो बच्चों को जाग्रत करते है कि पटाखा इस त्यौहार की परम्परा का हिस्सा नहीं है तो सरकार को भी कानून में आस्था बांधने के बजाय जागरूक करने के कार्यक्रम चलाये और एक वर्ग ही क्यों, हर किसी पंथ समुदाय से बुरे प्रभाव डालने वाली परम्परा हटाई जाये?

असल में दिवाली पर पटाखा जलाना हमारी कोई प्राचीन संस्कृति का हिस्सा नहीं है दीपावली पर लोग दिन में हवन यज्ञ करने के पश्चात रात्रि में दीपक जलाते थे. लेकिन बीस-तीस वर्षों में यह चलन तेजी बढ़ा और इस उत्सव की परम्परा का हिस्सा सा बन गया. पिछली दिवाली के दौरान वायु प्रदूषण में बढोत्तरी हुई थी हालाँकि पटाखों के अलावा कई कारणों थे जिसमें बड़े पैमाने पर पटाखों का प्रयोग के साथ हरियाणा पंजाब में पुराली जलाना भी शामिल था इस कारण सुप्रीम कोर्ट ने इस बार फैसले में कहा है कि दिवाली के बाद इस बात की भी जांच की जाएगी कि पटाखों पर बैन के बाद हवा की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है या नहीं,  दरअसल सर्वोच्च अदालत इस फैसले को एक प्रयोग भांति भी ले रही है क्योंकि अदालत ने कहा कि एक बार हम ये टेस्ट करना चाहते हैं कि पटाखों पर बैन के बाद क्या हालात होंगे?

देश के अन्य बड़े शहरों की तरह ही राजधानी दिल्ली में लोगों की आंखों में जलन और सांस लेने में समस्या की शिकायत व्यापक रूप में अक्सर सामने आ जाती है.  आंकड़े बताते है विश्वभर में 30 लाख मौतें, घर और बाहर के वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष होती हैं, इनमें से सबसे ज्यादा भारत में होती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत की राजधानी दिल्ली, विश्व के 10 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से एक है. सर्वेक्षण बताते हैं कि वायु प्रदूषण से देश में, प्रतिवर्ष होने वाली मौतों के औसत से, दिल्ली में 12 प्रतिषत अधिक मृत्यु होती है. दिल्ली ने वायु प्रदूषण के मामले में चीन की राजधानी बीजिंग को काफी पीछे छोड़ दिया है. लेकिन इसके बावजूद  भी सामाजिक दायित्व के निर्वहन के प्रति हमारा समाज पूर्णतः उदासीन ही नहीं बल्कि असंवेदनशील भी है. इसमें हमारी राजनीतिक मंशा भी मददगार होती है. हर रोज की बरती जा रही लापरवाही को लेकर हम कब सजग होंगे यह भी हमारे ऊपर ही निर्भर करता है. या फिर हर काम में कानून की दखल देगा?

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