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गाय के प्रभावशाली अतीत के खिलाफ साजिश

Posted On 5 Jun, 2017 में

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गाय के नाम पर धर्म या धर्मनिरपेक्षता में से कुछ बचे या न बचे, मूर्खता बची रहना पक्का है.  भारत सरकार ने पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम की एक धारा में बदलाव किया है. जिसमें जिन मवेशियों की मवेशी बाजार से ख़रीद होती है उनको मारा नहीं जा सकता है. इस नियम का दक्षिण भारत के कई इलाकों में विरोध कर बीफ पार्टियां तक आयोजित की गईं. खाने-पीने की स्वतंत्रता की मांग करना एक अलग बात है लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा केरल में केंद्र सरकार के फैसले के विरोध में सरेआम एक गाय को काटकर अपना विरोध जताना बहुत ही भद्दी और असंवेदनशील गिरी हुई हरकत है. पशुओं के अधिकारों पर बात करने वाले, जो लोग बैलों के लिए जल्लीकट्टू को बर्बर बता रहे थे. वो लोग आज केरल में हुई इस घटना पर बिल्कुल चुप हैं

गाय भारत का पशु ही नहीं बल्कि इसे आस्था की नजर देखे तो माता का दर्जा प्राप्त है लेकिन दुखद बात यह कि भारतीय राजनेता आज इसी माता पर अपनी राजनीति कर इसे सरेआम कत्ल कर रहे है. एक प्रभावशाली अतीत को समेटे इस वर्तमान भारत में जो चल रहा है वह काफी दुखद है. आज वर्तमान भारत में राजनेता अपने मूल्यों को भूलते जा रहे है. जिसका ये परिणाम ये प्राप्त हुआ की हमारे प्राण हमारे आदर्श महापुरुष और माँ तुल्य गाय उन दो कौड़ी के विदेशी लुटेरो के लिए गन्दी राजनीति का हिस्सा बनकर रह गये

हम मानते है सरकार और विपक्ष की बहुत सारे मुद्दों पर आम राय नहीं होती विरोध करना विपक्ष द्वारा राजनीति का एक हिस्सा होता है. सरकार से सवाल और आलोचना सरकार को सही राह दिखाती है. लेकिन सरकार के फैसले का विरोध जिस तरीके से केरल में किया गया यह भारतीय राजनीति का एक अशोभनीय चेहरा कहा जा सकता है. क्या आज विपक्ष यह समझ बैठा कि गाय के प्रति आस्था सिर्फ सत्ताधारी दल की बपोती है? नहीं गाय माता देश के लिए यहाँ के सांस्कृतिक धार्मिक मूल्यों के लिए उतना ही आस्थावान है जितना अन्य राष्ट्रीय मूल्य. आखिर क्यों आज सत्ता के लिए गाय को निवाला बनाया जा रहा है?

जब से बीफ पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग उठ रही है तभी से दक्षिण भारत में छात्रों का एक बड़ा सम्मूह ऐसा भी है जो इसका विरोध करता आ रहा है. हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में कई बार विरोध स्वरुप बीफ के फेस्टिवल का आयोजन किया है. जब इस फेस्टिवल को ज्यादा तरजीह नहीं दी गयी तब अचानक राजनीति बदलते हुए खान-पान की मांग को आगे करते हुए अलग देश द्रविड़नाडू की मांग होने लगी पहले ये मांग सिर्फ तमिलभाषी क्षेत्रों के लिए थी. लेकिन बाद में द्रविडनाडु में आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, ओडिशा और तमिलनाडु को भी शामिल करने की बात कही गई. यानी मांग ये थी कि दक्षिण भारत के राज्यों को मिलाकर एक नया मुल्क बनाया जाए, द्रविडनाडु.

ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं हो रहा है. ऐसा समय आया था जब क्यूबा के तत्कालीन राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने भी इसी तरह का क़ानून लागू किया था और गौवंश की ह्त्या पर प्रतिबन्ध लगाया था. लेकिन भारत में देखा जाये तो इसका उल्टा काम हो रहा है. राजनीति में तर्क का तर्क से और विचारधारा का विचारधारा से मुकाबला होते देखा था लेकिन पहली बार लोग नाजायज और क्रूर मांग लेकर आगे बढ़ रहे कोई इंसानों की हत्या कर गाय को बचाने की बात कर रहा है तो कोई गाय की हत्या कर अपना विरोध जता रहा है. सामाजिक चेतना, जीवों के प्रति दया, सहिष्णुता, उदारता आज कहीं दिखाई नहीं दे रही है. क्या ऐसा नहीं हो सकता गौवध बिना प्रतिबंध और तथाकथित गौरक्षा के हिंसक टोले की बजाय सिर्फ हमारे पुराने सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक चेतना से बच जाये?

केरल में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने 28 मई को विरोध स्वरूप जिस कार्य को अंजाम दिया वो नैतिकता की दृष्टि से अस्वीकार्य हैं. दरअसल, इस फैसले के जरिए सरकार जिस तरह के राजनीतिक फायदे की अपेक्षा कर रही होगी, युवा कांग्रेस के उस कृत्य से उसे उद्देश्यपूर्ति में लाभ ही मिलेगा. कुल मिलाकर समाज दो भागों में बंटता दिख रहा है. एक तरफ संवैधानिक अधिकारों और व्यापारिक हितों का हवाला देकर आदेश का विरोध कर रहे लोग और दूसरी तरफ गौ प्रेम में मनुष्यों की हत्या से भी बाज न आने वाले गौभक्त. गायों को मां कहा जाता है लेकिन उसकी देखभाल मां की तरह नहीं की जाती. गायों को बचाने के लिए उन पर ध्यान देना जरूरी है. शेरों के लिए करोड़ों खर्च करने वाली सरकार गाय के लिए खर्च नहीं करती. वजह ये है कि गाय की बात सांप्रदायिक हो जाती है.

दिक्कत ये है कि जब इतिहास या धार्मिक पुस्तक पढ़ने की बारी आती है तो राजनितिक दल उनका मजाक उड़ाते हैं. फिर जब राजनीति करनी होती है तो इतिहास और वेद आदि की अनाप शनाप व्याख्याएं करने लगते हैं. मौजूदा समय में राष्ट्रवाद का राजनीतिक इस्तेमाल राष्ट्रवाद की कोई नई समझ पैदा कर रहा है या जो पहले कई बार हो चुका है उसी का बेतुका संस्करण है. यह खतरनाक प्रवृत्ति है या लोग क्या सरकार और समाज ऐसे खतरों से निपटने में सक्षम हैं? क्योंकि अब या तो  देश को बांटने का षडयंत्र हो रहा है या फिर गौवंश के प्रभावशाली अतीत के खिलाफ साजिश सी होती दिखाई दे रही है.

राजीव चौधरी

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