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स्वार्थ में भगवाकरण का फैलाया भ्रम

Posted On: 15 Apr, 2017 में

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पिछले 2 दषकों से भगवाकरण भगवाकरण का प्रचार कर एक इसे साम्प्रदायिक शब्द बनाया जा रहा हैं। यह अनैतिक और अप्रासगिंक टिप्पणी निज स्वार्थ में साम्प्रदायिक या राजनैतिक लाभ की भावना से अधिक प्रसारित की जा रही हैं। भगवा ध्वज भगवावस्त्र को साम्प्रदायिक चिन्ह मानकर जन मानस के मनों मे इसके प्रति कटुता, वैमनस्यता फैलायी जा रही है। जबकि वास्तव में यदि सम्प्रदाय, मजहब, पन्तो, से उपर कोई विचार धारा है तो वह इसी भगवाध्वज की विचारधारा में ही है।

भगवा रंग हम अब कहने लगे वास्तव में यह अरूण रंग कहलाता था। जिस प्रकार सूर्य की लालिमा उदय और अस्त होते समय होती है यह वही रंग था। सनातन धर्म मे इसी रंग को श्रेष्ठ मान कर ध्वज के रूप में इसे सम्मान दिया। कोई भी रंग या ध्वज किसी संगठन जाति, देष का प्रतीक होता है। जिस प्रकार का ध्वज होगा उसके अनुसार ही उस संगठन के आदर्ष मान्यता और जीवन शैली का अनुमान लगाया जा सकता हैं। यह सनातन संस्कृति का पवित्र मान्य रंग है। यदि उस ध्वज के पीछे छिपे दर्षन को नहीं समझ पाये तो फिर इसके विपरीत भी तरह-तरह के अनुमान लगाये जाना सभंव होता हैं।

भगवा ध्वज या भगवे रंग के सबन्ध भी कुछ असत्य मान्यता प्रचिलित कर दी गई हैं जिससे समाज मे गलत संदेष जा रहा हैं। भगवारंग त्याग का स्नेह, प्रेम का पवित्रता का संदेष देता हैं। ये रंग अग्नि का रंग है अग्नि अपने सपर्क मे किसी वस्तु के आने पर उसे निर्मल करके कई गुना बढ़ा कर लौटाती हैं।

इससे कोई भी सीधा अनुमान यह लगा सकता है कि इस अरूण (भगवा) रंग के ध्वज का अनुयायी सनातन धर्मी हैं। ये सनातन शब्द क्या हैं- दुर्भाग्य से सनातन शब्द को भी जाति, सम्प्रदाय, देष भाषा के साथ जोड़ कर देखा जा रहा हैं। जैसे हिन्दू मुसलमान ईसाई आदि आदि सम्प्रदाय माने जा रहे है वैसे ही सनातन शब्द को भी इसी श्रेणी मे माना जा रहा है। यह बिलकुल असत्य व अज्ञानता के कारण ये मान्यता प्रचिलित हो गई हैं।

सनातन एक समय (काल) बोध कराने वाला शब्द है। जिसका अर्थ है जो सदा रहे, अर्थात जिसका न आदि है और न अन्त है जो सदा खड़ा रहे वह सनातन हैं। तीन बातों को सनातन कहा गया ईष्वर, प्रकृति और जीवात्मा ये तीनों सत्ताये सनातन है क्यों कि ये कभी नष्ट नहीं होती, अपितु सदा रहती हैं इनके अस्तित्व में बने रहने का समय सनातन हैं।

इस वर्तमान सृष्टि को बने लगभग 2 अरब वर्ष हो चुके हैं। पहले यह जानकरी महर्षि दयानंद ने अपनी प्रमुख पुस्तक ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका एवं सत्यार्थ प्रकाष में दी थी। किन्तु अब तो कई वैज्ञानिकों ने अनुसंधान के आधार पर इसे सिद्ध किया है। इतनी पुरानी मानव जाति है – इतना ही पुराना धर्म हैं क्योकि बिना धर्म के तो मनुष्य मनुष्य ही नहीं रह सकता यह धर्म ही समस्त मानव समाज का एक संविधान हैं। बिना संविधान के कोई छोटी सी संस्था या राज्य अथवा देश नहीं चल सकता। फिर परमात्मा के इस सम्पूर्ण जगत का संचालन बिना संविधान के कैसे हो सकता है।

प्रकाश आर्य (महामंत्री) सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा

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