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हम अन्धविश्वास लेस कब होंगे?

Posted On: 12 Dec, 2016 में

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हाल ही में प्रधानमंत्री जी के द्वारा एक अति महत्वकांक्षी सुझाव जनता को दिया जा रहा है “केशलेस” इसमें आप रुपयों की बजाय लोग मोबाइल से ही ट्रांजेक्शन कर लेन देन कर सकते है. बहुत ही अच्छा सुझाव है लेकिन यहाँ हमारे मन में एक प्रश्न उठा कि जब बिना रुपयों के कारोबारी लेन देन हो सकता है तो क्या भगवान की स्तुति प्रार्थना उपासना बिना आडम्बर पाखंड के नहीं हो सकती? सर्वसंज्ञान है कि सरकार ने यह योजना भ्रष्टाचार से निपटने के लिए बनाई है लेकिन हमारे देश में जितनी गहरी जड़ भ्रष्टाचार की है उतनी ही गहरी जड़ अन्धविश्वास की है. और विडम्बना देखिये दोनों एक दुसरे की पूरक है या कहो सामाजिक जीवन में एक दुसरे की मददगार भी है. वो कैसे देखिये हजारों साल से भाग्यवादी मनुष्य एक चमत्कारी शक्ति की आस में बैठा है कि वो आएगी और हमारे दुःख दूर करेगी. उसके लिए उसने धार्मिक स्थान बना डाले और उस काल्पनिक चमत्कारी शक्ति की प्रतीक्षा करने के बाद उसने खुद ही पत्थरों के भगवान बना डाले. जब उसनी आशा अनुरूप या कल्पना स्वरूप चमत्कार नहीं हुआ तो उन्होंने नाना प्रकार के पाखंड खड़े किये और भिन्न-भिन्न प्रकार से उन मूर्तियों को सजाना, खिलाना, कपडे पहनाना, ढोल नगाड़े बजाकर खुश करना चाहा ताकि कोई चमत्कार होकर उनका भाग्य बदल जाये. जिसके लिए लोगों ने जिन्दा प्राणियों की बली भी देना शुरू कर दिया और इस सारे आडम्बर को धर्म से जोड़ दिया. ताकि कोई मानवीय द्रष्टिकोण रखने वाला प्रश्न ही ना उठा सके.

अंधविश्वास के चश्मे से कभी धर्म दिखाई नही देगा उससे हमेशा कीर्तन, भंडारे, जागरण दिखाई देंगे जो सीधा-सीधा अर्थ से जुड़े है अब कारोबारी के पास तो पैसा है वो धार्मिक दिख सकता है किन्तु माध्यमवर्ग उस जैसा दिखने के भ्रष्टाचार करेगा. गरीब उसमे उपस्थित होकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा. क्योंकि इन पाखंडियों के अनुसार तो आडम्बरो से इन्सान पाप मुक्त हो जाता है. कोलाकता वाली माँ काली माँ से मांगी गई सभी मुरादें क्षण में पुरी हो जाती है.! सिद्धि प्राप्ति के लिए पंडितों और साधुओं का जमावड़ा लगा रहता है! माँ से मांगी गई सभी मुरादें क्षण में पुरी हो जाती है.! इसीलिए तो यहाँ बलि देने की परम्परा आज भी बरकरार है! मंगलवार और शनिवार को विशेष भीड़ होती है. दूसरा अगर आप गरीब हैं तो उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित माणा गांव में आइए. यहां भगवान शिव की ऐसी महिमा है कि जो भी आता है उसकी गरीबी दूर हो जाती है. तो फिर क्यों उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में गरीबी है? यहीं नहीं इस गांव को श्रापमुक्त जगह का दर्जा प्राप्त है. ये माना जाता है कि यहां आने पर व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है. यही नहीं वहां के पंडित बताते हैं कि इस गांव में आने पर व्यक्ति स्वप्नद्रष्टा हो जाता है.जिसके बाद वह होने वाली घटनाओं के बारे में जान सकता है.

जो भारत अभी तक इन अन्धविश्वासो पर टिका है जो भारत अभी तक अपने भाग्य को बदलने के लिए जीवित पशुओं की बली देने से नहीं चुकता उस भारत को केसलेस करने से पहले अन्धविश्वास लेस करना जरूरी है ताकि लोग कर्मो के तूफान अपने अन्दर पैदा कर पुरुषार्थी बने. अभी कई रोज पहले एक खबर पढ़ी कि उत्तरकाशी जिला मुख्यालय के अन्दर यहां पंडित की पोथी, डाक्टर की दवा और कोतवाल का डंडा काम नहीं आता है. कंडार देवता के दर पर जो पहुंच गया तो कंडार देवता का आदेश ही सर्वमान्य है. लोग यहां जन्मपत्री, विवाह, मुंडन, धार्मिक अनुष्ठान, जनेऊ समेत अन्य संस्कारों की तिथि तय करने के लिए पंडित की तलाश नहीं करते. मात्र यहीं नहीं बल्कि, आस पास के गांवों में जब कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है तो उसे उपचार के लिए कंडार देवता के पास ले जाया जाता है. इसी तरह मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर से करीब 8 कि.मी. दूर, क्षिप्रा नदी के तट पर कालभैरव मंदिर स्थित है. यह एक वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर है. इस मंदिर में मांस, मदिरा, बलि, मुद्रा जैसे प्रसाद चढ़ाए जाते हैं. काल भैरव को मदिरा पिलाने का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है.

बेशक इन सब क्रियाकांडों में हमारे अतीत का कुछ हिस्सा रहा हो लेकिन अब हम आधुनिक युग में है जब हम अतीत में थे हो सकता वो सही रहा हो पर आज हम नवीन युग में है. इस पर कुछ लोग तर्क रखते है कि यह हमारी पुरातन मान्यताएं है इन्हें कैसे झूठा मान ले? लेकिन उस काल में हम पैदल चला करते थे यायायात के साधन हमारे पास मौजूद नहीं थे. आग जलाने के लिए माचिस या लाईटर नहीं था. आज हमारे पास यातायात के साधन है हम बस रेल में सफर करते है जब हम उन परम्पराओं चलन को नकार सकते है इन अन्धविश्वासी परम्पराओं को क्यों नहीं? हम अपने अतीत की निंदा नहीं कर रहे है बस उस अतीत से निकलने का मार्ग बता रहे है कि अब हम जीवन तो 21 वी सदी का जी रहा पर अन्धविश्वास अतीत का लिए बैठे है. आज हमे तर्क से ज्यादा प्रेम और करुणा मानवता को अंधविश्वास से मुक्त करने के लिए जरूरी है. जो बिना निंदा किए, लोगों के अंदर स्वयं समझ पैदा हो इस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा करना, कुछ भी उनके ऊपर ना लादना, ना अपने ऊपर लादना. वाकई प्रकाश को जान लिया है, जिन्होंने अंतस आलोक को जान लिया है जिन्होंने अपने वेदों को जान लिया वे कभी भी किसी के अँधेरे से व्यथित नहीं होंगे. यदि उस प्रकाश को कोई ग्रहण ना करना चाहे तो फिर भी हम उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे. इसीलिए यह बहुत ही जरूरी है कि हम अपनी पूरी ऊर्जा, पूरा ध्यान स्वयं के विकास में लगाएँ, स्वयं का दिया जलाएँ अन्धविश्वास लेस भारत बनाये…विनय आर्य

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