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कश्मीर पर पाकिस्तानी अजान?

Posted On: 8 Sep, 2016 में

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हुर्रियत नेताओं ने भारतीय संसदीय दल से बातचीत करने से मना कर दिया. अब कश्मीर के मामले में भारत पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाने को पाकिस्तान अपने 22 सांसदों का दल विश्व के अलग-अलग देशो में भेजेगा| ये 22 प्रतिनिधि जाकर विश्व के अन्य देशो को बतायेंगे कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है| इनमे एक सांसद है, “अल्म्दाद लालिका” ये चीन जायेंगे और वहां बताएँगे कि कश्मीर हमारा है दुसरे है “मलिक परवेज” ये लाहौर में अवेध कब्जे करने के लिए जाने जाते है पर ये जनाब हिंसा और इस्लामिक आतंक से झुझते देश तुर्की को समझाने जायेंगे, एक तीसरे है “अब्दुल रहमान” ये दक्षिण अफ्रीका जायेंगे और अफ़्रीकी समुदाय को बतायेंगे कि कश्मीर उनका है| लिस्ट लम्बी है और इसमें सबसे गजब बात ये है कि इनमें आधे से ज्यादा सांसदो को अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है| सर्वविदित है कि पिछले 70 सालों से पाकिस्तान कश्मीर को लेकर परेशान है| जिस कारण एक बार फिर घाटी के कई जिले हिंसा से बुरी तरह प्रभावित है| डल झील में हॉउसबोट सुनसान दिखाई पड़ते है तो घाटी के सभी होटल खाली पड़े है| ईश्वर ने जम्मू कश्मीर को अप्रतिम प्राकृतिक सुषमा एवं जल संसाधन प्रदान किए हैं जिनका पर्यटन के संवर्धन के लिए समुचित ढंग से दोहन करने की जरूरत है। श्रीनगर में पर्यटन की वजह से जिन लोगों का भी कारोबार चलता है, उन लोगों में मायूसी छाई हुई है ञात हो कि पिछले साल 2015 में सबसे पीक सीजन 2014 में आए बाढ़ की वजह से प्रभावित हो गया था। इस साल वहां के कारोबारी उम्मीद लगाकर बैठे थे लेकिन श्रीनगर में चल रही हिंसा की घटनाओं ने एक बार फिर से उनकी उम्मीदों को झटका दिया है।

शायद लोगों के मन में यही सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर यह सब क्यों हो रहा है? कुछ महीने पहले दिल्ली के जेएनयू से कश्मीर की आजादी के लिए निकला नारा कश्मीर में पंहुचकर घाटी को इस तरह लाल बना देगा किसी ने सोचा भी नहीं होगा| आज वहां सड़कें सूनी हैं। चौक पर बिखरे पत्थर, कंटीले तार और जली हुई गाड़ियां जंग सा अहसास कराते हैं। गलियों की खिड़कियों के टूटे कांच से खौफ झांकता दिखाई देता है| मुख्यमंत्री मुफ़्ती ने कहा है 95  फ़ीसद लोग बातचीत के ज़रिये सूबे में शांति की बहाली चाहते हैं और सिर्फ़ पांच प्रतिशत पूरी प्रक्रिया में रुकावट पैदा कर रहे हैं| अब प्रश्न यह है कि ये पांच प्रतिशत 95 प्रतिशत आबादी पर हावी कैसे होते है तो सुनिए पिछले दिनों एक प्रसिद्ध न्यूज़ चैनल की घाटी से रिपोर्ट आई थी कि वहां पर कदम-कदम पर मस्जिदों और मदरसों का निर्माण हो रहा है जो घाटी के लिए सबसे खतरनाक हो चला है| एक तरफ गरीब तबका और दूसरी ओर आलिशान मस्जिदे इस बात की गवाह है कि मस्जिदों में लगा धन वहां के लोगों के बजाय विदेशी है| तो सोचिये उनका सञ्चालन कहाँ से हो रहा होगा! इन मदरसों में कौन लोग पढ़ा रहे है और उनकी गतिविधियां क्या रहती इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया| कुछ स्थानीय लोगों के अनुसार सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने का काम अलगावादी ताकतों के द्वारा इन्ही मदरसों के छात्रों को उकसाकर कराया जाता है| हिजबुल कमांडर बुरहान की मौत के बाद कश्मीर में सबने देखा है कि किस तरह मस्जिदों से मोमिनो का आवाहन होता रहा| घाटी में आजादी के गीत और इस्लाम के नाम पर सहादत की नज्म और तराने सुनाई देते रहे|

दरअसल कश्मीर पर पाकिस्तान की डबल नीति है एक को लॉन्ग टर्म पॉलिसी और दूसरी को शोर्ट टर्म बोला जाता है| लॉन्ग टर्म तो कश्मीर को हासिल करने की है और शोर्ट टर्म पॉलिसी यह है जब भी कश्मीर में कोई घटना हो तो उसे तुरंत मजहब से जोड़कर लोगों को उकसाकर हिंसा द्वारा उसका फायदा उठाया जाना| अब सवाल यह है कि सीमा पर सेना होने के बावजूद घाटी में पाकिस्तान की ये मजबूत पकड कैसे है? तो सुनिए अलगावादी नेता यासीन मलिक की पाकिस्तानी पत्नी मुशाल मलिक इन्ही दिनों पाकिस्तान में कश्मीर की आजादी का केम्पेन चला रही है तो अलगाववादी नेता गिलानी भी हर रोज कश्मीर बंद का आहवान करते है इसमें आसिया हो या मीरवाइज उमर इन लोगो ने घाटी के अन्दर अपनी एक वैचारिक फौज तैयार कर ली है|तो इस विचार को धन भी पाकिस्तान से मुहया हो जाता जिसका उपयोग शांत कश्मीर को अशांत बनाकर किया जाता है|

कुछ रोज पहले ही एक रिपोर्ट के हवाले से पता चला था कि एक पत्थरबाज को इस काम को करने के 5 सौ रूपये मिलते है| दरअसल, घाटी में पत्थरबाजों ने एक रूल बना रखा है। हर घर से एक व्यक्ति को प्रदर्शन में भीड़ बढ़ाने जाना जरूरी है। नहीं गए तो अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो। संवेदनशील इलाकों में ज्यादा फोर्स तैनात रहती है। शुक्रवार को ज्यादा बढ़ा दी जाती है। शाम को जब ये फोर्स अपने कैम्प में लौटने लगती है तो लड़के पीछे से उन पर पथराव करते हैं। हर रोज घंटे दो घंटे इन पत्थरबाजों का यही ड्रामा चलता है। सेना भी पहले पत्थर से ही इनका जवाब देती है। जब ये कैम्प और उनकी गाड़ियों के नजदीक आने लगते हैं तो आंसू गैस और रबर बुलैट का इस्तेमाल करती है। अगर भीड़ ज्यादा है और बेकाबू होने का खतरा है तब जाकर पैलेट गन चलाई जाती है। यहां भीड़ कई बार कुल्हाड़ी फेंकती है। पिछले एक महीने में तीन चार बार भीड़ में से एके-47 से फायर किया गया और ग्रेनेड भी दागे गए। हालाँकि विपक्ष ने संसद से लेकर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक की मांग की, जिसके बाद गृह मंत्रालय का एक एक्सपर्ट पैनल पैलेट गन की जगह ‘पावा शेल्स’ यानी मिर्ची के गोले के इस्तेमाल पर विचार कर रहा है|

अक्सर कश्मीर के मुद्दे पर कई बार आम भारतीय सोचता है कि आखिर इस समस्या को भारत क्यों लिए डोल रहा क्यों वहां पर सैनिक मर जाते है क्यों वहां देश का पैसा वहां बर्बाद किया जा रहा है? इन सारे प्रश्नों का जबाब राजनाथ सिंह ने कश्मीर पहुंचकर दिया कि हिंदुस्तान का भविष्य कश्मीर के भविष्य से जुड़ा हुआ है| क्यों है जुडा हुआ इसका जबाब यह है कि घाटी में बेहिसाब जल श्रोत व् दुर्गम वनस्पति का भंडार है जिनपर चीन की नजर है| इस वजह से चीन हिमालय क्षेत्र पर कब्ज़ा करना चाहता है| कश्मीरी आज नासमझ है वो नहीं समझ पा रहे कि उनकी असली स्वतन्त्रता उनके नैतिक मूल्य उनकी कश्मीरियत उनके हित तब तक जिन्दा है जब तक वो भारत के साथ है| जिस दिन भारत अपना दावा छोड़ देगा उस दिन पाक की सहायता से चीन तिब्बत की तरह कब्ज़ा कर जायेगा फिर ना कश्मीर बचेगा ना कश्मीरियत| ..rajeev choudhary

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Foge के द्वारा
October 17, 2016

Very valid, pithy, suctnicc, and on point. WD.


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