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पर्यावरण दिवस कोई उत्सव नहीं!

Posted On: 1 Jun, 2016 में

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कहीं ऐसा तो नहीं कि विश्व पर्यावरण दिवस प्रकृति को समर्पित दुनियाभर में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा उत्सव मात्र बनकर रह गया| या फिर एक दिन अखबारों में सोशल मीडिया आदि पर शुभकामनायें देने तक सिकुड़ कर रह गया हो? यदि हाँ और हालात यही रहे तो वह दिन दूर नहीं जब बाज़ार से शुद्ध ऑक्सीजन का पाउच लेकर हम सांस लिया करेंगे। कुछ वर्ष पहले तक क्या हम यह सोचते थे कि पानी खरीद कर पीना पडेगा? किन्तु आज पी रहे है| दिन पर दिन नदिया के अस्तित्व पर खतरा मंडराता जा रहा है| बड़े जल स्रोत सूख रहे है, वनों का क्षेत्रफल घट रहा है| वैज्ञानिको का ऐसा अनुमान है कि प्रकृति ने वायुमंडल की दूसरी परत में ओजोन गैसों के रूप में जीवधारियों के लिए जो रक्षात्मक आवरण दिया है उसका दस प्रतिशत इस सदी के अंत तक नष्ट हो जाएगा। दिनोंदिन गम्भीर रूप लेती इस समस्या से निपटने के लिए आज आवश्कता है एक ऐसे अभियान की, जिसमें हम सब स्वप्रेरणा से सक्रिय होकर भागीदारी निभाएँ। इसमें हर कोई नेतृत्व करे, क्योंकि जिस पर्यावरण के लिए यह अभियान है उस पर सबका समान अधिकार है। ताकि पर्यावरण दिवस हमारे लिए कोई उत्सव ना होकर एक जिम्मेदारी भरा दिवस बन जाये|

आमतौर पर देखा जाता है कि लोगों को जागरूक करने की दिशा में सरकार पर्यावरण बचाने के नाम पर हर साल करोड़ो रूपये विज्ञापन पर खर्च करती है| किन्तु फिर भी सुधार न के बराबर है नतीजा ढाक के तीन पात| दूसरा आज जहाँ भी नजरे दौड़कर देखते है तो दिन पर दिन हरे भरे पेड़ पौधों की जगह सीमेंट कंक्रीट के मकान नुमा जंगल और जहरीला धुआं उगलती फेक्टरियाँ ले रही है जिस कारण प्रदूषण की मात्रा इतनी अधिक बढ़ती जा रही है कि इंसान चंद सांसें भी सुकून से लेने को तरसने लगा है। कहीं ऐसा तो नहीं की प्रकृति को नष्ट कर हम अपना गला अपने ही हाथों से तो नहीं घोट रहे है?

सबसे दुखद यह है कि आज पर्यावरण के रखरखाव को लेकर पश्चिमी देश हमे सचेत कर रहे है| जबकि हम तो इनसे कई हजार साल आगे है|  प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों की जीवन में क्या उपयोगिता है? इसका ज्ञान वैदिककाल में ही हमारे ऋशि मुनियों ने हमे दे था।  ऋग्वेद कहता है इस ब्रह्मांड में प्रकृति सबसे शक्तिशाली है, क्योंकि यही सृजन एवं विकास और यही ह्रास तथा नाश करती है। अतः प्रकृति के विरुद्ध आचरण नहीं करना चाहिए। प्राचीनकाल से हम यह चिंतन के अनुसार सुनते आए हैं कि जीव पंचमहाभूतों जल, पृथ्वी, वायु, आकाश , अग्नि से मिलकर बना है इनमे से किसी की भी सत्ता डगमगा गई तो इसका हश्र क्या होगा, यह सभी जानते हैं। फिर यह अज्ञानता क्यों? पढ़-लिखकर भी मनुष्य अज्ञानी बनकर स्वार्थ तक सिमट गया है। वह इन तत्वों के प्रति छेड़छाड़ को गंभीरता से क्यों नहीं ले रहा है। जहां हम कहते जा रहे हैं कि हम भौतिक सुख-संपदा में आगे बढ़ रहे हैं, वहां उसके कुत्सित परिणाम का दमन क्यों भूल रहे हैं। जब तक किसी भी वस्तु, अविष्कार, खोज के गुण-दोष  को नहीं टटोलेंगे, तब तक आगे बढ़ना हमारे लिए पीछे हटने के बराबर है। पर्यावरण का ध्यान रखते हुए हम आगे बढ़े, तभी वह हमारे लिए सही अर्थों में आगे बढ़ना है।

प्रथ्वी का अस्तित्व बचाने के लिए जल तथा पर्यावरण प्रदूषण को हर तरह से रोकना होगा, नहीं तो लोगों के सामने इसका भयावह परिणाम आ सकता है। जैसे-जैसे विकास की रफ्तार बढ़ रही है, जीवनयापन भी कठिन होता जा रहा है लेकिन फिर भी शरीर से नित नयी व्याधियां जन्म ले रही हैं। आश्चर्य तो यह है कि पुराने समय में जब सुबह से शाम तक लोग प्रत्येक काम अपने हाथों से करते थे, तब वातावरण कुछ और था, पर्यावरण संरक्षित था। इसी को हमें ध्यान में रखना होगा। मानव जीवन प्रकृति पर आश्रित है। प्रकृति के साथ दुष्मन की तरह नहीं, वरन् मित्र की तरह काम करना शुरू करना होगा जिसके लिए हमें इस कार्य में किसी को नहीं जोड़ना बल्कि इस शुभ कार्य में इस अभियान में खुद को जोड़ना है| सोचो जब आगे आने वाली पीढ़ी हमसे साँस तक के लेने लिए शुद्ध हवा मांगेगी तो हम क्या जबाब देंगे? दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा लेख राजीव चौधरी

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Luck के द्वारा
July 11, 2016

Ich würd mich über Berichte über Trends/Styles abseits des aletigenwärglgen Mainstreams freuen! Neue kreative Looks in Wien aufspüren und posten…vor allen Dingen solche, die man nicht in jedem Blog sieht!


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