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पुराण का झूठ, सच!!

Posted On: 20 Feb, 2016 में

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पुराण में क्या सच है क्या झूठ, यह प्रश्न सिर्फ स्वीकारने और नकारने के लिए नहीं विषय आत्ममंथन का भी है और अब में कहता इनकी समीक्षा जरूरी है खेर एक कहानी सुनी थी वही कहानी दोहरा  रहा हूँ कहानी २००० वर्ष पुरानी है” हजारों वर्ष पहले उज्जयिनी नगरी में एक बगीचा था, जिसमे इलाके के नामी झूठे,धूर्त रोज बैठकर गप्पे लड़ाते थे| उनके मुख्य कथाकार चार थे, शश,एलाषाढ, मुलदेव और महा धुर्तनी खंडपाणा| एक बार जब बारिश के लगातार सात दिन तक छाए रहे तो सभी को कसकर भूख लगी थी| सवाल उठा खाने की व्यवस्था कौन करे? मूलदेव ने कहा कि एक-एक कर सभी धूर्त समागम में अपने साथ घटी घटना का अविश्वसनीय लगने वाला किस्सा सुनाएंगे चूँकि पुराणों की कथाओं की प्रमाणिकता सर्वमान्य है इसलिए अगर उनके हवाले से कही कथा सही साबित कर दी गयी तो अविश्वासी जन चारों को खाना खिलाएंगे| हाँ, यदि कथा इन महाकाव्यों की कसौटी पर सच साबित नहीं हुई तो कथावाचक खाने का भुगतान करेंगे|

पहली कथा कही एलाषाढ ने- “एक बार में गाये चराने जा रहा था तो सामने डाकू आते दिखे| मैंने तुरंत अपना कंबल उतारकर गायों को उसमे लपेटा और गठरी पीठ पर रख गाँव वापस आ गया| वही डाकू गाँव में आ पहुंचे| तुरंत में, मेरी गायें, ग्रामवासी सब एक ककड़ी में घुस गये जो एक बकरी ने खा ली| बकरी को एक अजगर निगल गया और उस अजगर को एक बगुला खाकर एक पेड़ पर जा बैठा, जहाँ से उसकी एक टांग नीचे लटकती रही| पेड़ तले एक राजा उसका हाथी और सेना विश्राम कर रहे थे| राजा का हाथी बगुले की टांग में उलझ गया बगुला उसे लेकर उड़ने लगा तो राजा ने शोर मचाया तीरंदाज़ आये बगुले को मार गिराया| जब बगुले का पेट फटा तो उसमे से हम सब बाहर निकले बाकि लोग तो गाँव चले गए मै गायें बाँध कर इधर चला आया| अब आप लोग कहे कहानी सच्ची है?” बाकि धूर्तो ने कहा एकदम सच्ची, हमारे पुराण बताते है कि प्रकृति के आरम्भ में बस समुन्द्र था जिसमें तैरते एक सुनहरे अंडे के भीतर यह सारी दुनिया चराचर जीव जंतु, पेड़पहाड़ समाये हुए थे तो फिर कंबल और ककड़ी में तुम सब समा गये तो अचरज कैसा? बगुले के पेट में अजगर उसके पेट में बकरी उसके अन्दर ककड़ी और तुम सब का होना पुराणों के अनुसार सही है| उनका कहना है कि यह सारी चराचर स्रष्टि विष्णु के भीतर विष्णु कृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ में और देवकी कारावास में नन्ही सी खाट पर समाई हुई है|

अब शश ने कहानी शुरू की- “मै अपने तिल की खेती को देखने रात को खेत पर गया तिल के पोधे इतने बड़े हो गये थे कि मै उनको कुल्हाड़ी से काटने लगा| तभी एक हाथी आया और में तिल के पेड़ पर चढ़ गया| हाथी पेड़ की परिक्रमा करते हुए पेड़ को झकझोरता रहा| जमीन तिलों से ढक गयी हाथी के पैरो से कुचले तिलों से कुछ समय बाद तेल की ऐसी वेगवान नदी निकली की हाथी फंसकर मर गया में नीचे उतरा, उसकी खाल उतारी और मशक बनाकर उसमे तेल भर लिया फिर मैने कोई दस घड़े तेल पिया और गाँव आकर मशक को पेड़ पर टांग दिया कुछ देर बाद मैंने अपने पुत्र को मशक लाने भेजा जब उसे ना दिखी तो वो समूचा पेड़ ही फाड़ उखाड़ लाया फिर में घुमने निकला और यहाँ आ पहुंचा| कहिये सच है या नही?” एक दम सत्य है सभी धूर्तो ने एक स्वर में कहा| महाभारत रामायण और अनेक श्रुतियों में भी उल्लेख है कि हाथियों के मद बिन्दुओं से वनोवन भा ले जाने वाली नदियाँ निकल सकती है जड़ी लाने के आदेश पर रामायण में हनुमान भी तुम्हारे पेड़ उखाड़ बेटे की तरह पर्वत उखाड़ लाये थे|

इसके बाद मुलदेव ने अपना किस्सा सुनाया- “एक बार मैने गंगा को शिरोधार्य करने की सोची| छत्र कमंडल लेकर अपने स्वामी के घर जाने लगा तो एक हाथी पीछा करने लगा| में कमंडल की टोंटी से उसके अन्दर प्रवेश कर गया पर उसकी के अन्दर हाथी भी घुस आया 6 माह तक मुझे परेशान करता रहा अंतत में फिर टोंटी से निकल भागा हाथी की दुम टोंटी में उलझी रह गयी फिर में गंगा के अथाह जल को चीरता पार हुआ 6 माह तक बिना खाये पिए उसके किनारे रहा फिर यहाँ आ गया| कहिये सच कि झूठ?” सौ फीसदी सच जब शास्त्र प्रमाण है कि किस तरह ब्रह्मा के नाना अंगो में समाए बैठे सारी जातियों के लोग बाहर निकले थे सो आप और हाथी एक कमंडल में समायें होंगे इसमें कैसा शक? विष्णु जगत के कर्ता हुए ब्रह्मा उनके उदर से निकले और आज तक तप कर रहे है पर उनके कमल की नाल विष्णु की नाभि में अटकी रही बेचारा हाथी भी पूंछ से अटक गया होगा और तुम्हारा गंगा को पर करना हनुमान के समुंद्र को पार करने जैसा है|

अब खंडपाणा की बारी आई- “मै राजा के धोबी की बेटी के साथ अपने एक हजार नौकरों और पिता सहित एक भैसगाडी में धुलाई लेकर गंगा तट पर गयी कपडे सुखाते हुए भारी आंधी आई मेरे पिता, कपडे, नौकर सब गायब हो गये राजकोप के डर से मै गिरगिट बन जंगल में छिप गयी कुछ समय बाद मुनादी सुनी की राजा ने सबको माफ़ कर दिया बाहर आई तो पिता मिले गाड़ी तो नहीं मिली पर भेंसे की पूंछ और उसमे लिपटी मीलो लम्बी रस्सी मिल गयी कहो सच कि झूठ?” सच है सभी धूर्त हँसे जब ब्रह्मा विष्णु को शिवलिंग की गहराई ना मिली तो तब तुमको अंधड़ में अपने साथी कैसे मिलते रही बात पूछ की तो हनुमान की पूछ याद करो| रुको अभी कथा बाकि है मित्रो खंडपाणा बोली| मेरे अनुसार तुम सब मेरे खोये नौकर हो तुम्हारे वस्त्र वही राजसी वस्त्र है अब कहो कथा सच है कि झूठ? अब यदि कथा सच है तो मेरे नौकर बनो वरना जाकर खाना लाओ| सभी धूर्त लाजवाब हो गए|,,,लेखक राजीव चौधरी

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhola nath Pal के द्वारा
February 24, 2016

मुझे याद आता है यह कहानी मृणाल जी नें कभी दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ परलिखी थी .याद ताजा होगई.धन्यवाद ……………….


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