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‘मैं उसके सामने गिड़गिड़ाने लगी”

Posted On: 23 Jan, 2016 Others में

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मई 2014 में बोको हरम के नेता अबू-बक्र-शेकऊ ने अफ्रीका में करीब 400  नाबालिग बच्चियों का अपहरण कर एक विडियों संदेश जारी किया था, उसने कहा था- अल्लाह ने मुझे इन लडकियों को बेचने का आदेश  दिया है और में अल्लाह के आदेश का पालन करूंगा इस्लाम में गुलामी जायज मानी जाती है और में दुष्मनों को अपना गुलाम बनाऊंगा इन लडकियों को स्कूल में नहीं होना चाहिए था बल्कि इनका निकाह हो जाना चाहिए था क्योंकि 9 साल की हर लडकी निकाह के लायक होती है। गौरतलब है कि दुनिया भर मुस्लिम कट्टरपंथी मोहम्मद साहब द्वारा 9   साल की आयषा से निकाह का हवाला देकर आज भी इस परम्परा को कायम रखने पर जोर देते है। किन्तु यह कैसी परम्परा जिसमे मासूम बच्चियों के मन की कोपलें पददलित हो जाये ह्रदय को द्रवित करने वाली एक ऐसी ही कहानी नदिया मुराद की है

नादिया मुराद को  इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथियों ने अगवा कर लिया था . कई महीनों की यौन प्रताड़ना झेलने के बाद वह किसी तरह उनके चंगुल से भागने में सफल रहीं. और अब दुनिया को यजीदियों पर हो रहे जुल्म की कहानियां सुना रही हैं . बीबीसी रेडियो के खास कार्यक्रम में नादिया की आपबीती उन्हीं की जुबानी. कथित इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों के आने से पहले मैं अपनी मां और भाई बहनों के साथ उत्तरी इराक के शिंजा के पास कोचू गांव में रहती थी. हमारे गांव में अधिकतर लोग खेती पर निर्भर हैं. मैं तब छठी कक्षा में पढ़ती थी.

बीते साल अगस्त में शिंजा पर इस्लामिक स्टेट के हमले के बाद अधिकतर यजीदी परिवार घर छोड़कर चले गए. हमारे गांव में कोई १७०० लोग रहते थे और सभी लोग शातिपूर्वक रहते थे. हमें किसी तरह की कोई चेतावनी नहीं मिली थी कि आईएस शिंजा या हमारे गांव पर हमला करने जा रहा है. 3 अगस्त 2014 की बात है, जब आईएस ने यजीदी पर हमला किया. कुछ लोग माउंट शिंजा पर भाग गए, लेकिन हमारा गाँव बहुत दूर था. हम भागकर कहीं नहीं जा सकते थे. हमें 3  से 15  अगस्त तक बंधक बनाए रखा गया. खबरें आने लगी थीं कि उन्होंने तीन हजार से ज्यादा लोगों का कत्ल कर दिया है और लगभग 5000 महिलाओं और बच्चों को अपने कब्जे में ले लिया है. तब तक हमें हकीकत का अहसास हो चुका था. इस दौरान चरमपंथी आए और हमारे हथियार कब्जे में ले लिए. हम पूरी तरह घिर चुके थे. हमें चेतावनी दी गई कि हम दो दिन के अंदर अपना धर्म बदल लें.

15 अगस्त को मैं अपने परिवार के साथ थी. हम बहुत डरे हुए थे क्योंकि हमारे सामने जो घटा था, उसे लेकर हम भयभीत थे. उस दिन आईएस के लगभग 1000 लड़ाके गांव में घुसे. वे हमें स्कूल में ले गए. स्कूल दो मंजिला  था. पहली मंजिल पर उन्होंने पुरूषों को रखा और दूसरी मंजिल पर महिलाओं और बच्चों को. उन्होंने हमारा सब कुछ छीन लिया. इसके बाद उनका नेता जोर से चिल्लाया, जो भी इस्लाम धर्म कबूल करना चाहते हैं, कमरा छोड़कर चले जाएं.अब मुझे कोई बताये की कैसे ये आतंक इस्लामिक नहीं है?. हम जानते थे कि जो कमरा छोड़कर जाएंगे वो भी मारे जाएंगे. क्योंकि वो नहीं मानते कि यजीदी से इस्लाम कबूलने वाले असली मुसलमान हैं. वो मानते हैं कि यजीदी को इस्लाम कबूल करना चाहिए और फिर मर जाना चाहिए. महिला होने के नाते हमें यकीन था कि वे हमें नहीं मारेंगे और हमें जिंदा रखेंगे और हमारा इस्तेमाल कुछ और चीजों के लिए करेंगे. जब वो मर्दों को स्कूल से बाहर ले जा रहे थे तो सही-सही तो पता नहीं कि किसके साथ क्या हो रहा था, लेकिन हमें गोलियां चलने की आवाजें आ रही थी. हमें नहीं पता कि कौन मारा जा रहा था. मेरे भाई और दूसरे लोग मारे जा रहे थे. इस्लामिक स्टेट लड़ाकों ने अधिकतर यजीदी महिलाओं को यौन गुलाम बना लिया था. वे नहीं देख रहे थे कि कौन बच्चा है कौन जवान और कौन बूढ़ा. कुछ दूरी से हम देख सकते थे कि वो लोगों को गांव से बाहर ले जा रहे थे. लड़ाकों ने एक व्यक्ति से एक लड़का छीन लिया, उसे बचाने के लिए नहीं. बाद में उन्होंने उसे स्कूल में छोड़ दिया. उसने हमें बताया कि लड़ाकों ने किसी को नहीं छोड़ा और सभी को मार दिया. जब उन्होंने लोगों को मार दिया तो वे हमें एक दूसरे गांव में ले गए. तब तक रात हो गई थी और उन्होंने हमें वहाँ स्कूल में रखा. उन्होंने हमें तीन ग्रुपों में बांट दिया था. पहले ग्रुप में युवा महिलाएं थी, दूसरे में बच्चे, तीसरे ग्रुप में बाकी महिलाएं. हर ग्रुप के लिए उनके पास अलग योजना थी. बच्चों को वो प्रशिक्षण शिविर में ले गए. जिन महिलाओं को उन्होंने शादी के लायक नहीं माना उन्हें कत्ल कर दिया, इनमें मेरी मां भी शामिल थी.

रात में वो हमें मोसुल ले गए. हमें दूसरे शहर में ले जाने वाले ये वही लोग थे जिन्होंने मेरे भाइयों और मेरी मां को कत्ल किया था. वो हमारा उत्पीड़न और बलात्कार कर रहे थे. मैं कुछ भी सोचने समझने की स्थिति में नहीं थी. वे हमें मोसुल में इस्लामिक कोर्ट में ले गए. जहाँ उन्होंने हर महिला की तस्वीर ली. मैं वहां महिलाओं की हजारों तस्वीरें देख सकती थी. हर तस्वीर के साथ एक फोन नंबर होता था. ये फोन नंबर उस लड़ाके का होता था जो उसके लिए जिम्मेदार होता था. इस्लामिक स्टेट के हमलों के बाद यजीदी समुदाय के वजूद पर ही खतरा पैदा हो गया है. तमाम जगह से आईएस लड़ाके इस्लामिक कोर्ट आते और तस्वीरों को देखकर अपने लिए लड़कियां चुनते. फिर पसंद करने वाला लड़ाका उस लड़ाके से मोलभाव करता जो उस लड़की को लेकर आया था. फिर वह चाहे उसे खरीदे, किराए पर दे या अपनी किसी जान-पहचान वाले को तोहफे में दे दे. पहली रात जब उन्होंने हमें लड़ाकों के पास भेजा. बहुत मोटा लड़ाका था. जब हम सेंटर पर गए तो मैं फर्श पर थी, मैंने उस व्यक्ति के पैर देखे. मैं उसके सामने गिड़गिड़ाने लगी कि मैं उसके साथ नहीं जाना चाहती. मैं गिड़गिड़ाती रही, लेकिन मेरी एक नहीं सुनी गई.

शरणार्थी शिविर में किसी ने मेरी आपबीती नहीं पूछी. मैं दुनिया को बताना चाहती थी कि मेरे साथ क्या हुआ और वहाँ महिलाओं के साथ क्या हो रहा है. मेरे पास पासपोर्ट नहीं था, किसी देश  की नागरिकता नहीं थी. मैं कई महीनों तक अपने दस्तावेज पाने के लिए इराक में रुकी रही. उसी वक्त जर्मन सरकार ने वहाँ के 1000  लोगों की मदद करने का फैसला किया. मैं उन लोगों में से एक थी. फिर अपना इलाज कराने के दौरान एक संगठन ने मुझसे कहा कि मैं संयुक्त राष्ट्र में जाकर आपबीती सुनाऊं. मैं इन कहानियों को सुनाने के लिए दुनिया के किसी भी देश में जाने को तैयार हूँ…..rajeev choudhary

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